*केवलारी में वनों की अवैध कटाई उजागर करने वाले पत्रकारों पर वन विभाग द्वारा बनाया जा रहा दबाव!*
हिन्द शिला (केवलारी):- केवलारी वन परिक्षेत्र में चल रहे अवैध सागौन कटाई के मामलों को उजागर करने वाले पत्रकारों के लिए अब मुश्किलें खड़ी हो रही हैं। जिन पत्रकारों ने वन माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ आवाज उठाई, अब उन्हीं को झूठे मामलों में फंसाने की धमकियां मिल रही हैं।
*पत्रकारों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग से खुली अवैध तस्करी की पोल*
केवलारी के पत्रकारों ने बीते कुछ दिनों में वन विभाग के घोटालों का खुलासा कर कई बड़े अधिकारियों को कटघरे में खड़ा कर दिया। वैनगंगा टाइम्स के संपादक प्रवीण दुबे, श्रमजीवी पत्रकार संघ के ब्लॉक अध्यक्ष रफीक खान, पत्रकार देवराज डेहरिया, पत्रकार स्वप्निल उपाध्याय, कृष्णाकुमार प्रजापति सहित अन्य पत्रकारों ने क्षेत्र में हो रही अवैध सागौन कटाई के खिलाफ रिपोर्टिंग की। इन खुलासों के बाद विभागीय जांच हुई और दोषी पाए गए 3 नाकेदार, 2 डिप्टी रेंजर और 1 रेंजर को निलंबित कर दिया गया, साथ ही एसडीओ पर भी कार्यवाही की अनुशंसा की गई।
*कार्यवाही से बौखलाए वन विभाग के अधिकारी*
जब वनों की अवैध कटाई के खिलाफ सही कार्रवाई न होते देख पत्रकारों द्वारा सीएम हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कर उच्च अधिकारियों पर भी कार्यवाही की मांग की। लेकिन अब वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी पत्रकारों के खिलाफ षड्यंत्र रचने लगे हैं।
*रेंजर ने दी मौखिक धमकी, शिकायत वापस लेने का दबाव*
आज 25 फरवरी की सुबह 10:40 बजे केवलारी के रेंजर दीपक नरवरे ने एक पत्रकार को फोन कर फॉरेस्ट ऑफिस बुलाया। जब वे दोपहर 11:02 बजे कार्यालय पहुंचे तो वहां पहले से मौजूद अधिकारी और कर्मचारी उन पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाने लगे। जब पत्रकार ने इसका विरोध किया तो उनका मोबाइल छीनने की कोशिश की गई एवं झुमाझपटी का प्रयास करने का प्रयास किया गया।
*पत्रकारों को झूठे मामलों में फंसाने की साजिश!*
इस घटना के बाद पत्रकार ने तत्काल केवलारी थाना पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई और वन विभाग के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की मांग की। पत्रकारों को आशंका है कि आने वाले दिनों में वन विभाग के अधिकारी उन्हें किसी झूठे मामले में फंसाने की साजिश कर सकते हैं।
*क्या वन विभाग खुद बन चुका है वन माफिया?*
केवलारी में वन विभाग की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। जिनका काम जंगल और वन्यजीवों की रक्षा करना है, वे अब खुद माफियाओं के साथ मिलकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं और जब पत्रकार सच उजागर करते हैं तो उन्हें धमकाया जाता है, झूठे केस में फंसाने की कोशिश की जाती है।
*पत्रकार सुरक्षा पर बड़ा सवाल!*
इस पूरे घटनाक्रम ने पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या प्रशासन अब इस मामले में निष्पक्ष जांच करेगा? क्या वन विभाग के इन भ्रष्ट अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होगी? या फिर सच्चाई उजागर करने वालों को ही निशाना बनाया जाएगा?
*शासन और प्रशासन से अपील*
पत्रकारों ने केवलारी पुलिस और प्रशासन से मांग की है कि वन विभाग के भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच हो और पत्रकारों को झूठे मामलों में फंसाने की साजिश पर तत्काल रोक लगाई जाए। अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है।


